बग़ीचा: संपादित की गई प्रकृति
बग़ीचा वहीं से शुरू होता है जहाँ कोई तय करता है कि कौन-से पौधे रहेंगे।
जंगली ज़मीन संयोग से उगती है, बग़ीचा घटाकर उगता है। किसी ने घुटनों के बल बैठकर तय किया कि यह पौध रहेगी और वह उखड़ेगी, और यही फ़ैसला बरसों दोहराया। तस्वीर में जो हिस्सा बिना मेहनत का लगता है, वह असल में एक आदमी और मिट्टी के बीच चली लंबी, धैर्य भरी बहस का बचा हुआ अंश है।
पहले किनारे देखिए। बाड़ की रेखा, बजरी का रास्ता, वह मोड़ जहाँ क्यारी मुड़ जाती है — ये बग़ीचे के वाक्य हैं, और सारा हरा रंग बस उनके भीतर भरी हुई सामग्री। बग़ीचे अक्सर खुले एपर्चर पर खींचे जाते हैं ताकि एक फूल भीड़ से अलग उठ आए, पर f/8 पर पढ़िए, फ़ील्ड की गहराई ईमानदार रहने दीजिए, तब वह ढाँचा दिखता है जिसने उन फूलों को संभव बनाया।
यहाँ की व्यवस्था सीधी रेखा को ज़्यादा देर नहीं थामे रखती। रास्ता मुड़ता है क्योंकि कोई चाहता था कि आप धीमे चलें; दीवार आधी बेल से ढकी छोड़ी गई क्योंकि नंगा पत्थर रूखा लगता था। स्क्रीन पर यह स्वभाव दुर्लभ निकलता है — ऐसी तस्वीर जिसके भीतर एक योजना है, और जो फिर भी आपको न देख पाने के लिए माफ़ कर देती है।
इस संग्रह में