एक होता है पतझड़ का रंग, और एक होता है उस मेपल का सोचा-समझा लाल जिसे चार सौ साल पहले ठीक वहाँ रोपा गया जहाँ नवंबर को उसकी ज़रूरत पड़ने वाली थी — धूसर पत्थर के बग़ल में, ठहरे पानी के ऊपर, एक द्वार से फ्रेम में जड़ा हुआ। ऐसे बाग़ उन लोगों ने लगाए जो पेड़ को कभी बड़ा होते नहीं देखने वाले थे। तस्वीरें उनका धैर्य जमा करती हैं।
यहाँ के फ्रेम भीगी काई पर पड़े इकलौते पत्तों से शुरू होकर अंगारे के रंगों में डूबी पूरी पहाड़ी ढलानों तक जाते हैं, जिन पर मंदिरों की छतें नावों की तरह तैरती हैं।
लाल वॉलपेपर के लिए एक माँग करने वाला रंग है, पर पतझड़ का लाल अलग है — वह पहले से नरम होकर आता है, पहले से आधी याद बन चुका। वह स्क्रीन को गर्माता है, उस पर चिल्लाए बिना।