ऊपर देखना: ज़मीन के बिना बने फ़्रेम
कैमरा पेड़ों की फुनगियों से ऊपर उठते ही तस्वीर अपना फ़र्श खो देती है, और उसके साथ नाप का अंदाज़ा भी।
जैसे ही ज़मीन फ़्रेम से बाहर जाती है, तस्वीर जगह होना छोड़ देती है। भीतर जाने के लिए कोई रास्ता नहीं, नापने के लिए कोई क्षितिज नहीं, और कोई नहीं बता सकता कि ये तने तीस मीटर के हैं या तीन। बचती है तो बस एक दिशा, जो वहीं रोक दी गई है।
ऐसी तस्वीर में सब कुछ झुका होता है। नीचे समानांतर खड़े तने ऊपर जाकर एक-दूसरे की ओर सरक आते हैं, और उनके बीच का आसमान पृष्ठभूमि नहीं, एक फटा हुआ आकार बन जाता है। एक्सपोज़र भी आसान नहीं रहता: वह झिरी पत्तों की पीठ से कई स्टॉप चमकीली होती है, इसलिए शटर या तो पत्ती की नसें बचाता है या बादल, दोनों कम ही।
स्क्रीन पर यही अटपटापन काम आ जाता है। क्षितिज की रेखा न होने से आइकनों की कतार या डॉक के किनारे से कोई खींचतान नहीं होती, और आँख पूरी तस्वीर को नज़ारे की जगह बनावट की तरह पढ़ती है। वॉलपेपर पीछे टिका रहता है, क्योंकि वह कभी पूरा लैंडस्केप बना ही नहीं था।