जली हुई खिड़कियाँ: शहर की रातभर की जाली
अँधेरा होते ही इमारत अपना आयतन छोड़ देती है और सिर्फ़ हिसाब बचा रहता है।
दिन में इमारत एक ठोस चीज़ होती है — कंक्रीट, काँच, दिखता हुआ वज़न। आसमान की रोशनी बुझते ही आयतन भी उसके साथ चला जाता है और अँधेरे में बस जगमगाते छोटे आयतों की एक जाली रह जाती है। बत्तियाँ एक साथ नहीं जलतीं; वे एक-एक खाना भरती जाती हैं, किसी के समय पर नहीं।
एक मिनट देखिए और खाने आपस में मेल खाना छोड़ देते हैं। दफ़्तर वाली मंज़िलें ठंडी सफ़ेद हैं, दो मंज़िल नीचे रसोई कहरुवे रंग की है, एक खिड़की नीली टिमटिमाती है क्योंकि वहाँ टीवी अब भी चल रहा है। नदी के उस पार से यह क्रम जैसा लगता है, जबकि असल में कुछ सौ लोग अलग-अलग तय कर रहे हैं कि घर कब लौटना है। बुझे हुए खाने इस तस्वीर को उतना ही सँभालते हैं जितना जले हुए।
वॉलपेपर के तौर पर यह अचरज भरी सहूलियत देता है। उजाला थोड़ा है और पृष्ठभूमि ईमानदार काली, इसलिए आइकन और लिखावट खाली मंज़िलों पर बिना टकराए बैठ जाते हैं। छायाओं को उठाने के बजाय एक्सपोज़र नीचा ही रहने दें — दूर से पूरा मुखौटा बनावट बन जाता है, और पास से हर खिड़की अब भी गिनी जा सकती है।