ग्रामीण परिदृश्य की फ़ोटोग्राफ़ी बेफ़िक्र चीज़ों का अध्ययन है: अस्सी साल से कुछ न करती एक बाड़, अपनी रफ़्तार से सूखता चारा, एक गली जो एक पेड़ के इर्द-गिर्द मुड़ जाती है क्योंकि पीढ़ियों पहले किसी ने उसे काटने से इनकार कर दिया था। इन तस्वीरों में किसी ने भी कभी समय-सीमा का नाम नहीं सुना।
यहाँ की तस्वीरें नरम घड़ियों में जमा की गई हैं — छतों पर सुबह का हल्का धुआँ, ठूँठ वाले खेतों पर देर का सोना, सूर्यास्त के बाद वह नीला मिनट जब फ़ार्महाउस की खिड़कियाँ एक-एक करके जल उठती हैं।
शहरी स्क्रीनें उसी वजह से ग्रामीण वॉलपेपर से भर जाती हैं जिस वजह से शहरी अलमारियाँ उपन्यासों से भरती हैं: किसी ज़िंदगी से भागने के लिए नहीं, बल्कि याद रखने के लिए कि और भी घड़ियाँ हैं।