इतने साफ़ उथले पानी में कि वह लगभग गायब ही लगे, नाव अपनी परछाईं सतह पर नहीं, तल पर डालती है। बीच का एक-दो मीटर पानी लगभग कुछ भी दर्ज नहीं करता, इसलिए पतवार अपनी ही गहरी आकृति के ऊपर लटकी दिखती है, जैसे कोई पक्षी खेत के ऊपर ठहरा हो। कुछ असाधारण नहीं हो रहा; रोशनी बस एक ऐसे माध्यम से गुज़र रही है जिसने अपनी घोषणा करना छोड़ दिया है।
यह दृश्य किस्मत नहीं, शर्तें माँगता है। सूरज सिर के लगभग ऊपर हो, ताकि सतह से कम लौटे और नीचे अधिक जाए; हल्के रंग की रेत हो जो उसे वापस भेजे; और इतनी शांति हो कि पानी की त्वचा हर चीज़ बिखेरने में व्यस्त न रहे। थोड़ी देर और देखिए तो लंगर की ज़ंजीर ने तल पर एक चाप खींच रखा है, रात भर हवा किस ओर चली इसका धीमा रिकॉर्ड।
वॉलपेपर के रूप में ऐसा फ़्रेम असाधारण रूप से शालीन होता है। भार नीचे रहता है, परछाईं और ज़ंजीर के पास, जबकि ऊपरी आधा हिस्सा नीले का खुला मैदान बना रहता है जहाँ आइकन और खिड़कियाँ कुछ ज़रूरी ढके बिना बैठ सकती हैं। यह ऐसी तस्वीर की तरह पढ़ी जाती है जिसमें जगह बची हो, और स्क्रीन पर जगह सुंदरता से अधिक दुर्लभ है।