वॉलपेपर कितने दिन में बदलना ठीक रहता है
जो तस्वीर अब दिखनी बंद हो गई, वह कोई काम नहीं कर रही।
तीसरे दिन के आसपास वॉलपेपर तस्वीर रहना छोड़ देता है और मेज़ का रंग बन जाता है। आँख उसे फर्नीचर के खाते में डालकर सीधे आइकनों पर चली जाती है। तस्वीर में कोई खोट नहीं; उसे इतनी बार देखा जा चुका है कि वह अदृश्य हो गई — जो कभी हिलता नहीं, उसका अंत यही होता है।
ज़्यादातर स्लाइडशो सेटिंग्स इसका इलाज हर मिनट या हर दस मिनट पर बदलाव से करना चाहती हैं, यानी एक झंझट के बदले बड़ा झंझट: जहाँ पृष्ठभूमि चाहिए थी वहाँ हलचल आ जाती है। दिन में एक बार, या हफ़्ते में एक बार, सच के ज़्यादा नज़दीक है। और सेट छोटा रखना बेहतर है। पाँच सौ तस्वीरों का फ़ोल्डर हर सुबह एक अजनबी थमा देता है; आठ की जोड़ पहचानी हुई लगने लगती है, और पहचान ही बदलाव को महसूस कराती है।
ऐसी तस्वीरें चुनना काम आता है जो अनदेखी झेल जाएँ। एक क्षितिज, एक ही रंग का फैलाव, लगभग ठहरा हुआ पानी — ये सौ उचटती नज़रों के बाद भी टिके रहते हैं, और जिस दिन आप सचमुच देखें उस दिन कुछ बचा भी रहता है। सबसे अच्छा वॉलपेपर वही है जो हफ़्ते में दो बार ध्यान खींचे और बाकी समय चुपचाप पीछे रहे।