खेत सबसे कम नाटकीय परिदृश्य है — न कोई चट्टान, न कोई झरना, बस क्षैतिज धैर्य। फिर उजाले का आख़िरी घंटा आता है और पूरी सपाट दुनिया पीतल में बदल जाती है। गेहूँ तंतु बन जाता है। घास को अपनी-अपनी छाया मिल जाती है। साधारण को अपना चित्र नसीब होता है।
इन तस्वीरों में ढलता सूरज और लंबी छायाएँ साझा हैं, पर मिज़ाज नहीं: कुछ फ़सल जैसी गर्म हैं, कुछ बेहतरीन ढंग से अकेली, एक-दो में मंगलवार को ख़त्म होती गर्मियों की वह ख़ास उदासी है।
दिन के आख़िर की गर्म रोशनी दरअसल वही है जिसकी नक़ल आपकी स्क्रीन का नाइट मोड करता है। इनमें से कोई एक लगाकर, नक़ल और असल आख़िरकार मिल जाते हैं।