एक ही वॉलपेपर हर स्क्रीन पर अलग दिखता है
एक फ़ाइल, दो पैनल, और एक ढलती धूप जो अपने ही रंग तापमान पर सहमत नहीं होती।
एक ही तस्वीर लैपटॉप पर और बाहरी मॉनिटर पर लगाइए, फ़र्क़ उसी क्षण दिखने लगता है। एक जगह ढलती धूप नारंगी की ओर झुकती है और भारी लगती है, दूसरी जगह वह गुलाबी की ओर बहकर एक परत हल्की पड़ जाती है। बीच में फ़ाइल के साथ कुछ नहीं हुआ, पिक्सेल बाइट दर बाइट वही हैं। अलग वह सब है जो पैनल उन्हें पढ़ने के बाद करता है।
इसका बड़ा हिस्सा व्हाइट बैलेंस का है। स्क्रीनें कारख़ाने से अलग-अलग रंग तापमान लेकर निकलती हैं, गर्म पैनल तटस्थ स्लेटी को क्रीम की तरफ़ धकेलता है और ठंडा पैनल उसे नीले की ओर खींचता है। बाक़ी को चमक फिर से जमाती है, क्योंकि बैकलाइट कम होते ही तस्वीर का गहरा आधा हिस्सा सिमट जाता है और परछाइयों की परतें अलग नहीं रहतीं। उसके बाद कलर गैमट आता है, क्योंकि sRGB में सहेजी गई तस्वीर चौड़े गैमट वाले डिस्प्ले पर अक्सर उससे अधिक संतृप्त पहुँचती है जितनी फ़ोटोग्राफ़र ने छोड़ी थी, और अँधेरा होते ही नाइट फ़िल्टर पूरे फ़्रेम को चुपचाप गर्म कर देता है।
इनमें से किसी को पूरी तरह ठीक करने की ज़रूरत नहीं, पर चुनते समय इन्हें ध्यान में रखने की ज़रूरत है। जिन तस्वीरों में पूरा विस्तार हो, थोड़ा सफ़ेद के पास, थोड़ा काले के पास, कुछ तटस्थ सतहें, वे स्क्रीन बदलने पर एक ही संतृप्त रंग की सपाट सतह से बेहतर टिकती हैं, जो हर डिग्री का खिसकाव खोलकर रख देती है। तुलना करनी हो तो नाइट मोड बंद कीजिए, पहले चमक बराबर कीजिए, फिर सेटिंग छेड़ना छोड़ दीजिए। वॉलपेपर को बस उसी स्क्रीन पर सही दिखना है जिसके सामने आप इस समय बैठे हैं।