दो नीले: एक आसमान का, एक पानी का
दोनों को एक ही फ़्रेम में रख दीजिए, आँख बिना कहे तुलना शुरू कर देती है।
क्षितिज तस्वीर के हिस्से आया एक अजीब-सा सौभाग्य है। वह दो नीलों को किनारे से किनारा सटाकर रख देता है, बीच में कुछ भी ऐसा नहीं छोड़ता जो तुलना को नरम कर सके। नज़र सीधे उसी रेखा पर गिरती है और नापने लगती है, और एक पल के भीतर तय कर लेती है कि आसमान और समुद्र एक ही नीला नहीं हैं, कभी थे भी नहीं।
वजहें इतनी सूखी हैं कि सुंदर लगने लगती हैं। आसमान बिखरी हुई पतली रोशनी है, सिर के ऊपर दिन भर लगभग एक ही सुर में। पानी का नीला उधार का है — कुछ हिस्सा सतह पर लेटा हुआ आसमान, कुछ वह रोशनी जो नीचे जाकर अपने लाल रंग गँवाकर लौटती है, और बाकी तल से आता है: रेत, काई, या दस मीटर का सूनापन। इसीलिए किनारे के पास समुद्र हरे की ओर झुकता है और खुले पानी की तरफ़ ठंडा पड़ता जाता है, जबकि उसके ऊपर का आसमान समतल और एकसार बना रहता है। पोलराइज़र एक को बदल देता है और दूसरे को मुश्किल से छूता है — यही सबसे साफ़ सबूत है कि ये एक ही नाम पहने दो अलग चीज़ें हैं।
वॉलपेपर की तरह यह तस्वीर धीमी आवाज़ में काम करती है। दो बड़े शांत तल, बीच में कम कंट्रास्ट वाली एक सिलाई, और आइकनों से होड़ लेता कोई ब्योरा नहीं। असल फ़ैसला बस इतना है कि वह रेखा कहाँ छोड़ी जाए: नीचे रखिए तो स्क्रीन ज़्यादातर आसमान रहेगी और डॉक को जगह मिलेगी; ऊपर रखिए तो पूरा दिन पानी देखते बीतेगा। दोनों ही सूरतों में तस्वीर टिकी रहती है, जो अधिकतर तस्वीरों से नहीं हो पाता।