गर्म और ठंडा: एक ही फ़्रेम में दो रंग-तापमान
अच्छी तस्वीरें अक्सर दो ऐसी रोशनियों से बनती हैं जिनकी आपस में नहीं बनती।
दिन ढलते-ढलते सूरज नारंगी पड़ जाता है, और जिस चीज़ को वह छूता है वह भी उसी तरफ़ चली जाती है। जहाँ धूप नहीं पहुँचती, वहाँ रोशनी सिर्फ़ आसमान से आती है, और आसमान नीला है। दोनों हिस्से एक ही तस्वीर में अलग-अलग रंग-तापमान थामे रहते हैं, और आँख विषय से पहले यही फ़र्क़ पढ़ती है। बर्फ़ पर पड़ी छाया धूसर नहीं होती, नीली होती है, और शुरू से नीली ही थी।
व्हाइट बैलेंस दरअसल कैमरे से पक्ष चुनने को कहना है। धूप के हिसाब से सेट करो तो छाया कोबाल्ट में डूब जाती है; छाया के हिसाब से सेट करो तो रोशनी उस बल्ब का रंग ले लेती है जो खाली रसोई में जलता छूट गया हो। कोई तटस्थ जवाब नहीं है, बस वह सेटिंग है जिसमें यह फ़र्क़ पढ़ने लायक़ बचा रहे — आमतौर पर दोनों के बीच कहीं, और जान-बूझकर थोड़ा ग़लत।
स्क्रीन पर यही बँटवारा गहराई बन जाता है, जबकि तस्वीर में सचमुच कुछ भी दूर नहीं होता। गर्म रंग आगे आते हैं, ठंडे पीछे हटते हैं, और इसी रेखा पर बना वॉलपेपर आइकनों को बैठने की जगह दे देता है। ठंडा हिस्सा फ़ोल्डर सँभाल लेता है; गर्म हिस्से के पास डेस्कटॉप का वह कोना रह जाता है जिसे आप सबसे कम देखते हैं।